सुरज कुमार और डॉ. विवेक प्रकाश सिंह
21वीं सदी में सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक एवं राजनीतिक क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति के उपरांत भी भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति संतोषजनक नहीं कही जा सकती। पितृसत्तात्मक सोच एवं रूढ़िवादी परंपराएं आज भी महिलाओं के समुचित विकास में गंभीर बाधा उत्पन्न करती हैं। यह लैंगिक असमानता मात्र भारत तक सीमित नहीं है, अपितु यह एक वैश्विक समस्या बन चुकी है, जो महिलाओं को शिक्षा, राजनीतिक, सामाजिक जीवन सहित विभिन्न क्षेत्रों में पीछे करती है। यद्यपि लैंगिक समानता की दिशा में कुछ सकारात्मक प्रगति अवश्य हुई है, तथापि वर्तमान समय में भी महिलाएं सामाजिक-सांस्कृतिक मान्यताओं तथा प्रणालीगत पूर्वाग्रहों के कारण अनेक अवसरों से वंचित रह जाती हैं। भारत में यह समस्या आर्थिक विषमता, शिक्षा में असंतुलन, लिंग आधारित हिंसा एवं कमजोर विधिक संरचना के कारण और अधिक जटिल रूप धारण कर चुकी है। यदि हम ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य की बात करें तो प्राचीन काल में महिलाएं वेद, दर्शन एवं ज्ञान के क्षेत्र में अग्रणी रही हैं। मैत्रेयी, गार्गी एवं लोपामुद्रा जैसी विदुषियों के योगदान इसका सशक्त प्रमाण हैं। परंतु आधुनिक युग में विभिन्न सरकारी एवं गैर-सरकारी योजनाओं ने महिलाओं को सशक्त बनाने की दिशा में प्रयास किए हैं। बिहार सरकार द्वारा प्रारंभ की गई “जीविका योजना” विशेष रूप से महिलाओं के सामाजिक एवं आर्थिक सशक्तीकरण को केंद्र में रखती है। इस योजना ने ग्रामीण महिलाओं को स्वावलंबी बनाने, आत्मनिर्भरता विकसित करने और सामुदायिक भागीदारी को प्रोत्साहित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
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